मन गंगाजल सा निश्छल | कविता

6235629-children-lying-in-clover-with-heads-together-vertically-framed-shot-stock-photoमन गंगाजल सा निश्छल बच्चों का
मीठी है मुस्कान
जैसे लगता स्वयं प्रकट हो
धरती पर भगवान
इनसे ही परिवेश हमारा
इनसे ही रखते है आस
सूरज सा चमके ये प्रतिपल
नित चूमे आकाश
दे गये चाचा नेहरू इनको
जन्मदिवस पर उपहार
बालदिवस पर याद कर रहा
उनको ये संसार

बच्चे कोरे कागज सम है
हमको तस्वीर बनाना
ग्यान और मानवता का नित
पाठ नया पढ़ाना
शिक्षा रूपी सागर मे गोते
हरपल ये लगायेंगे
इस महान भारत का गौरव
गान सदा ही गायेंगे
इनसे ही है भारत का
स्वर्णिम नवीन बिहान
आँखों मे छटते बादल का
उमड़ता हुआ तूफान
मन गंगाजल सा निश्छल बच्चो का
मीठी है मुस्कान॥

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3 Responses

  1. Gopal Rai says:

    Bachche hi kal ka bhavishya hain. Kanchan ji kavita achchi lagi.

  2. कंचन जी! कविता अच्छी है।उन्मुक्त उड़ान में आपकी कविताओं की आगे भी प्रतीक्षा रहेगी।
    ज्ञान शब्द गलत प्रिंट हुआ है(ग्यान)

  3. Kanchan Sahu says:

    Thnks Gopal Ji aur Sndhya Ji
    Wo typing me mistake h future me dhyan rkhenge

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