नई उड़ान | कविता


चलो बटोरें अवशेषों को,
फिर एक नई उड़ान भरें,
आज झुका दे अम्बर को भी,
अब ऐसी हुंकार भरें,

पाँव सम्भालें अपने हम,
अपने हांथ पकड़ ही खुद,
खुद का सहरा बन पाएं,
अब ऐसी दीवार बनें,

जल रहा सूरज आसमां मे,
जग को राह दिखाने को,
खुद को राह दिखा पाएं,
अब हम ऐसी आग बनें,

खड़े विटप समान हों,
गिरें तो झरना बन जाएं,
खुद को मंजिल तक पहुंचाएं,
अब हम ऐसी राह बनें।

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1 Response

  1. sonu says:

    Very nice jeevan ji

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