खोता बचपन | कविता

मैने देखा खोता बचपन
सड़कों व गलियारों में
नन्हे-नन्हे हाथों से
चुनते कूड़ा चौबारों में

जंग जीतनी है जिनको
बढ़ते कालाबाजारी से
भ्रष्टाचार अधर्म व फैले
हिंसा के आसारी से
जिनके सपने हिमगिर की
चोटी को छूने वाले हैं
इस धरती पर समता के
बीजों को बोने वाले हैं
उनके ही उम्मीद हैं लूटते
बीच भरे बाज़ारों में
मैने देखा खोता बचपन
सड़कों व गलियारों में

कभी देखते इधर उधर तो
कभी आपस में थे लड़ते
जगह किताबों के रद्दी बोझा
लादे कंधो पर थे चलते
हमउम्रों को मगन खेल में
देख वहीँ पर ठिठक गये
बढ़े खेलने को उनके पग
पर जाने क्यूँ ठिठक गये
हुआ प्रतीत ऐसा ये जैसे
एक हैं जिम्मेदारों में
मैने देखा खोता बचपन
सड़कों व गलियारों में

कहीं हाथ में केतली थामे
होटल में दिख जाते हैं
केवल दो रोटी के खातिर
बचपन दाँव लगाते हैं
दिखते कहीं लगाते पोंछा
कहीं उठाते थे पत्तल
तन पर वस्त्र नहीँ थे पूरे
न पांवों में थे चप्पल
रहे ठिठुरते ठण्ड में लेकिन
चादर चढ़ गये मजारों में
मैने देखा खोता बचपन
सड़कों व गलियारों में

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