मंजिल तेरी अब दूर नहीँ | कविता

ऐ पथिक तू पथ पे बढ़ता जा
मंजिल तेरी अब दूर नहीँ
मंजिल तेरी अब दूर नहीँ
न होना थककर चूर कहीं
ऐ पथिक तू पथ पे बढ़ता जा
मंजिल तेरी अब दूर नहीँ

जो कदम तू पीछे हटायेगा
तो लक्ष्य कभी न पायेगा
बस लक्ष्य साधकर चलता जा
इक नई लीक तू गढ़ता जा
इतिहास के पन्नों में सिमटी
गाथा जाये न भूल कहीं
ऐ पथिक तू पथ पे बढ़ता जा
मंजिल तेरी अब दूर नहीँ

मन में उम्मीद के दीप जला
फिर कल्पनाओं से उसे सजा
हिय में बस अब दृढ़ निश्चय कर
ले धैर्य संग तू आगे बढ़
साकार उसे अब करनें में
न होने पाये चूक कहीं
ऐ पथिक तू पथ पे बढ़ता जा
मंजिल तेरी अब दूर नहीँ

असहाय को सदा सहारा दे
पीड़ित को गले लगाये जा
निश्वार्थ भाव हो निर्मल मन
कण्टक पथ पर तू पुष्प बिछाये जा
इस स्वार्थ नीति में पड़कर तू
न जाये पथ में भटक कहीं
ऐ पथिक तू पथ पे बढ़ता जा
मंजिल तेरी अब दूर नहीँ

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