लिये हूँ बैठी मैं चन्द धागे | कविता

लिये हूँ बैठी मैं चन्द धागे
सजाने तेरी कलाई सूनी
जरा प्यार से इसको स्वीकार कर लो
हो जायेंगी सारी ही खुशियाँ दूनी

महज ये धागा नहीँ है इसमें
बसी है अपनी यही दुआएं
बँधे रहें प्रीत के पाश में हम
रिश्ते सभी दिल से मिलके निभाये

बनो तुम जलता चिराग ऐसा
कि कोई आँधी बुझा न पाये
चलो उसूलों पर इस कदर
कि कोई ताकत गिरा न पाये

हर एक दर पर लुटानें खुशियाँ
हाथ ये अपना सदा बढा़ना
लगे जो ठोकर कहीं डगर में
संभल के खुद औरों को उठाना

पुकरेगी जब भी द्रौपदी तुमको
बनोगे कृष्णा वचन ये दे दो
पहन के रक्षा के इस कवच को
रस्म में जकड़ा गगन ये दे दो

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1 Response

  1. अनुपम सृजन ! आभार “एकलव्य”

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